Sunday, October 12, 2008

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हिन्दू खान भाई-

                    उसे यह पता नहीं कि उसका यह नाम कैसे पड़ा । कोई कहता उसके पिता मुस्लिम थे और मां हिन्दू तो कोई कहता उसकी मां मुस्लिम थी और पिता हिन्दू । कोई कोई और कुछ कहता लेकिन जबसे उसने होश संभाला है तब से उसे यह आभास होने लगा है कि वह हिन्दू भी है और मुस्लिम भी है। उसे नहीं पता,वह कब से पांचों वक्त की नमाज अदा करने लगा है और उसे यह भी नहीं पता कि वह कब से रोज़ सुबह उठकर घर के कोने में प्रतिस्थापित भगवान की प्रतिमा की आरती उतारता रहा है। वह हिन्दुओं के त्यौहारों पर ,चाहे वह गणेश पूजन हो,डोल ग्यारह हो,नवरात्रा में दुर्गा पूजन हो,रामनवमी हो या कृष्ण जन्माष्ठमि हो,मनाता रहा है।


                 वह चारों धाम की यात्रा भी कर आया है और हज़ भी कर आया है। वह एकादशी,नवरात्रा व्रत,सत्यनारायण व्रत,जन्माष्टमी व्रत भी रखता है तो रोजे भी रखता है। वह गीता रामायण पढ़ता है तो कुरान शरीफ भी पढ़ता है।उसे तो बस इतना पता है कि वह हिन्दुओं के सारे पूजा पाठ से लेकर मुस्लिमों की सारी इबादतें भी करता रहा है। मुस्लिमों के सारे त्यौहार मनाता है । मीठी ईद,बकर ईद,शब्बारात से लेकर पीरगाहों तक वह इबादत करने जाता है। वह मन्दिरों में दोंनों वक्त जाता है तो मस्जिदों में भी नमाज अदा करने जाता है। हां,लेकिन उसने लिबास में बदलाव न लाते हुए महात्मा गांधी का अनुसरण करते हुए सारा लिबास पसन्द किया 1


                 वह अक्सर खादी की धोती और खादी का ही कुर्ता पहनता है। कभी जूता नहीं पहनता बल्कि खादी भण्डार जाकर अपने लिए सारा चप्पलें ले आता है। यही है उसका पहनावा । इसी पहनावे को लेकर मोहल्ले के लोग,दोस्त और साथ में उठने बैठनेवाले उसे हिन्द खान भाई कहकर सम्बोधित करते है।मित्रों और परिचितों में वह दो तरह से जाना जाता है। हिन्दू उसे हिन्दू भाई से सम्बोधित करते तो मुस्लिम उसे खान भाई से सम्बोधित करते । कोई उससे पूछता है कि उसके माता पिता का नाम क्या है तो वह हंसकर बताता है कि उसकी माता का नाम भारत माता है और पिता का नाम हिमाला है। वह अपना मज़हम भारतीय बताता । वह कहता है जिस देश में हिन्दू मुस्लिम एकता और भाईचारे के साथ रहते है वहां हिन्दू और मुस्लिमों में कोई भेद ही नहीं है। यह भेदभाव हिन्दू मुस्लिमों में नहीं है लेकिन इस भेदभाव की खाई नेताओं ने अपने स्वार्थ को लेकर तैयार की है।

                 हम भारतियों में फूट डालकर राज करने के लिए तैयार की है ताकि हम लोग आपस में लड़ते मरते रहें और ये नेता हम पर राज करते रहे । हमारा शोषणा करते रहे ।करीब पच्चीस तीस बरस पहले वह काजी बाबा को एक मेले में मिला था । बाबा बताते हैं ,शहर में कोई मेला लगा था और वह उसी मेले में रोते बिलखते हुए मिला था।पहले तो पुलिस से सहायता ली कि इसके मां बाप का पता लगाकर इसे उनके सुपुर्द कर दें लेंकिन उसे मां बाप का पता नहीं चला । पुलिस उसे अनाथालय भेज रही थी किन्तु काजी बाबा के अनुरोध पर पुलिस ने उसे उन्हें दे दिया । काजी बाबा उसे अपने साथा ले आए । काजी बाबा इस आसमंजस्य में पड़ गए थे कि वह जाने किस मज़हब का है हिन्दू है या मुस्लिम है। उन्होंने इस पचड़े में पड़ने की बजाय उसे दोनों मजहबों की तालीम देने लेगे । उसे कुरानशरीफ से लेकर गीता रामायण तक की शिक्षा दी । इबादत नमाज रोजे से लेकर पूजा पाठ और व्रत उपवास करना भी सिखाया ।

               अब की बार ईद और दीपावली साथ साथ आई थी । शायद दीपावली के बाद ईद पड़ी थी । उसने दीपावली और ईद मनाने की तैयारी साथ साथ शुरू कर दी थी । महिने भर पहले से ही वह इस तैयारी में लग गया था । वह जितनी तवज्जो मुस्लिम मज़हब को देता उतनी ही हिन्दू मजहब को दे रहा था ।अभी दो दिन ही त्यौहारों के बाकी थे कि राजनीति के चलते मन्दिर मस्जिद विवाद के बहाने दोनों समुदाय में दंगे का महौल बन गया । दोनों एक दूसरे के रक्त के प्यासे हो गए


                 उस रोज़ वह घर में ही था । काजी बाबा मस्जिद गए हुए थे। बाहर शोरगुल सुनकर वह बाहर आ गया । देखता है,दरवाज़े की एक ओर दस बीस हिन्दू हथियार लिए खड़े है तो दरवाज़े की दूसरी ओर भी इतने ही मुस्लिम भी हथियार लिए खड़े है। वह समझ नहीं पाया कि इतने सारे लोग हथियार लिए उसके दरवाज़े के सामने इस तरह क्यों खड़े है। वह दोनों ओर देखते ही रह गया । हिन्दु्ओं ने हथियार उठाए और ऊंची आवाज़ में बोले,” मारो,मारो , बच न पाएं ।दूसरी ओर से मुस्लिम भी ऊंची आवाज़ में बोले,” मारो,मारो , बच न पाएं ।हिन्दुओं और मुस्लिमों ने हथियार उठा लिए ।

 

              अब तक वह स्थिति समझ चुका था । वह चीख पड़ा,” किसको मारोगे,मुझको,क्या मैं हिन्दू नहीं हूं या क्या मैं मुस्लिम नहीं हूं । बताओ मैं कौन हूं।उसका इस तरह चीखकर प्रश्न करना हिन्दुओं और मुस्लिमों को भारी पड़ रहा था । वे समझ नहीं पा रहे थे कि जिसे वे मारने के लिए यहां एकत्र हुए है,वह हिन्दू है या फिर मुस्लिम है। वह फिर चीख पड़ातुममें जो हिन्दू है वह मुस्लिम समझ कर मुझे मारें और तुममें जो मुस्लिम है वे हिन्दू समझकर मुझे मारें। बताओ तुम किसको मारना चाहते हो । क्या तुम बता सकते हो कि मैं हिन्दू हूं या मुस्लिम । मैं एक इन्सान हूं क्या तुम लोग एक इन्सान को मारना चाहते हो,तो मारों,मैं यह खड़ा हूं ।हिन्दू और मुस्लिम समझ नहीं पा रहे थे कि वह उसे क्या समझ कर मारें। हिन्दू या मुस्लिम। उनके हथियार उठे के उठे ही रह गए -.

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राम का जैसे वनवास

  राम का जैसे वनसारा जीवन मेरा राम का जैसे वनवास हो गया ।

कुटिल खल कामियों के लिए जैसे परिहास हो गया..

 

मेरा यह प्रयत्न रहा सबको प्रसन्न करूं मैं

हो छोटे चाहे बड़े सबको नमन करूं मैं

खाली हाथ न जाने पाये कोई मेरे व्दारे से

हो भूखा चाहे प्यासा सबको तर्पण करूं मैं

 

सबकी आवभगत करने का मुझको जैसे अभ्यास हो गया

मैं नत मस्तक होकर इनका उनका सबका दास हो गया..ण—–

 

मैंने जिस जिसको भी चाहा हितैषी अपना माना

जिस जिसने जैसा चाहा गाया वैसे ही गाना

दिन को कहा रात, रात को दिन कह डाला

हां मे हां, ना में ना, बता किया उजाला

 

मानवता की खातिर मैं आज जैसे खल्लास हो गया

मेरा सारा जीवन तप तप कर जैसे सन्यास हो गया…..

 

जितना गरल पीता रहा उतना होते रहा परिष्कृत

जिस जिसके भी निकट जाना चाहा होते रहा तिरस्कृत

मेरे भलमनसाहत का हृदय रहा सदा ही टूटता

मेरे अपनों ने किया है इस तरह मुझको बहिष्कृत

 

साथ साथ उठते बैठते अपनत्व का जैसे उपहास हो गया

सारा जीवन मेरा अब तो जैसे खाली गिलास हो गया…

 

 

 

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Wednesday, October 8, 2008

आहूति

मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं…….

मैं ही यजमान मैं ही यज्ञ का होता हूं……..

 

पसन्द नहीं है उसको फूल पत्ती और गुलकन्द

वह भूखा तड़पता होता और वे खा रहे होते कलाकन्द

आंसू पोंछ कर गले स्नेह से लगाना पर्याप्त है

हवन कर निज का दुःख दारिद्र मिटाना पर्याप्त है

 

समर्पित निज को कर स्वयं हवन बन लेता हूं

मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं…….

 

बड़े बड़े महलों राजप्रसाद किसके लिए

धन वैभव संपत्ति जायजाद किसके लिए

छोड़कर हाथ खुले चल देना होगा एक दिन

रह जाना होगा धरा का धरा यहां बिखरा हुआ

 

इसलिए मैं अपना सारा उपवन दे देता हूं

मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं…….

 

जो जीवित है श्रद्धा नहीं उसके प्रति

बाद मृत्यु श्राद्ध की क्या आवश्यकता

भोग छप्पन चढ़ाये जाते बाद मरने के

जीताजी रूला रूला कर लड़पाने की क्या आवश्यकता

 

श्राद्ध नहीं मैं श्रद्धा को वरमाला पहना देता हूं

मैं कर्म यज्ञ में निज की आहूति देता हूं……

                                                          

                     -.कृष्णशंकर सोनाने

 

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